पितृसत्तात्मक परिवार और लिंग-भेद के मुद्दे

'पितृ-सत्ता' शब्द परिवार में पिता की भूमिका के शाब्दिक अर्थ से लिया जाता है और इसमें समाज में महिलाओं के ऊपर पुरुषों का शासन समाविष्ट कर लिया गया है। पितृसत्तात्मक प्राधिकार महिलाओं की उत्पादन क्षमता और उसके शरीर पर पुरुष के नियंत्रण पर आधारित हैं। परन्तु  यदि ठीक-ठीक कहा जाए, तो अपने नाते-रिश्तेदारों में परिवार के पुरुप मुखिया का पितृसत्तात्मक प्रभुत्व शास्त्रीय प्राचीनता स काफी अधिक प्राचीन हैं और यह तर्क दिया जा सकता है कि 19वीं शताब्दी में परिवार में पुरुष के प्रभुत्व ने नए रूप ले लिए और ९ समाप्त नहीं हुआ। अतः, पितृ-सत्ता का अपनी व्यापक परिभाषा में अर्थ यह है कि परिवार में महिलाओं और बच्चे पर पुरुष के प का साकार करना और संस्थागत बनाना तथा समाज में महिलाओं पर पुरुष के प्रभुत्व के विस्तार का सामान्य अर्थ यह है कि का सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं में पुरुष शक्तिसंपन्न होता है और महिलाएं इस प्रकार की शक्ति तक अभिगम करने से वंचित रखी है। इसका आशय यह नहीं है कि महिलाएं अधिकार, प्रभाव और संसाधनों से पूर्णतः वंचित हैं।


 परंपरावादियों के स्पष्टीकरण के केन्द्र में महिलाओं की प्रजनन क्षमता है और उनके अनुसार महिलाओं के जीव मातृत्व है। महिलाओं का माता संबंधी कार्य समाज की उत्तरजीविता के लिए अत्यावश्यक माना गयाइस दम प्रकार जेविक अंतर पर आधारित धम के लिंग भेद मूलक विभाजन को प्रकार्यात्मक और न्यायसंगत समझा गया। सबसे पहले लड़कों को विशेष महत्व प्रदान किए जाने की बात आती है। इस प्रकार किसी म पातन-पोषण किए जाने से विभिन्न प्रकार के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और भौतिक विशेषाधिकार लेने का सभा पारवार को आर्थिक अवस्थिति पर आश्रित होता है। लड़कियों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण की शरूआत जाता है। इस लोक में कन्या के आगमन पर उसका स्वागत निराशा और हताशा से किया जाता है, इसके अतिरिक पालन-पोषण में उदासीनता और उपेक्षा भी वरती जाती है। लड़की के पालन में जिस तरह की उपेक्षा की जाती है वह क भी देखी जा सकती है जैसे कि लड़की को बड़ा करना रेत में पानी रोकने जैसा है। तेलुगु की एक अभिव्यंजना में इसे जाति रूप से प्रकट किया गया है कि लड़की का पालन करना एक अन्य अहाते के पौधे को पानी देने की तरह है। लड़कियां अपने में समाज की अस्थाई सदस्यता में बड़ी होती हैं। में एक लड़के के रूप लेने का आनंद मिलता हैयह आत स्वयं जन्म से ही हो सके अतिरिक्त वालिका के पेक्षा की जाती है वह कुछ मुहावरों में यंजना में इसे अधिक कारगर मराह है। लड़कियां अपने पैतृक घर में समाज की अस्थाई सदस्यता में बड़ी होती हैं


लड़कियों को खुद अपना भार उठाने पर काफी अधिक महत्व दिया जाता है। लड़की को सहजता से चलना चाहिए। उसे भागना, कूदना, चढ़ना नहीं चाहिए क्यांकि यह सभी पुरुषोचित गुण माने जाते हैं। यही वजह है कि महिलाओं को खेल में लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता। वय सन्धि के आरंभ होते ही लड़कियों की आवाजाही और पुरुषों के साथ उनके व्यवहार पर कठोर प्रतिबंध लग जाते हैं। इन प्रतिबंधों के प्रत्यक्ष परिणामों में से एक यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश अभिभात लड़कियों के वड़ी होते ही, उन्हें विद्यालय से निकाल लेते हैं। दूसरी वात यह है कि विवाह के लिए आयु-सीमा विहित किए जाने के के होते हुए भी अभिभावक लड़कियों का पहला मासिक-धर्म शुरू होते ही उनका विवाह कर देते हैं। यहां पर सर्वाधिक चिंता की बात यह है कि लड़की की यौनेच्छा के प्रबंधन को उसके भावी पत्नी और मां की भूमिका के साथ वांध दिया जाता है। चंकि धर्म अनुसार महिला के मुख्य लक्ष्य विवाह और मातृत्व हैं, इसलिए मध्यमवर्ग के अधिकतर परिवार यह महसूस करते हैं कि उच्चतर शिक्षा लिए लड़कियों को भेजना वेकार है जवकि लड़कों की शिक्षा को भविष्य का निवेश समझा जाता है


शेशवावस्था में ही पुरुषोचित कार्य और स्त्रियोचित कार्य के वीच भेद कर दिया जाता है और वच्चे के विकास के साथ-साथ यह बढ़ता जाता है। लड़की को सतत रूप से उसके स्त्री होने और इससे जुड़े हुए स्त्रियोचित कार्यों का स्मरण कराया जाता रहता है। यदि लड़कियां घरेलू कामों में दिलचस्पी नहीं दर्शाती, तो उनको झिड़का और अपमानित किया जाता है ताकि लड़की में पैदा किए गए अन्य महत्वपूर्ण मूल्यां जैसे सेवा भावना, आत्मवंचन और त्याग की पुष्टि की जा सके। लड़कियों को दर्द सहना और उसे जो कुछ भी परोसा जाता है, उसे खाना और शिकायत न करना सीखना चाहिए। यह उस यथार्थ के प्रशिक्षण का एक भाग होता है जिसका उसे अपनी ससुराल में सामना करना पड़ सकता हैमध्यम वर्ग के अनेक परिवारों में पुरुष सदस्य अपना भोजन खाकर घर की लड़कियों या महिलाओं के लिए प्लेटें साफ करने के लिए छोड़ जाते हैं। यह पुरुष का विशेषाधिकार समझा जाता है जिससे केवल महिलाओं के कार्य में वृद्धि होती है।


सजगता से निर्मित महिलाओं की भूमिका, जोकि सांस्कृतिक विचारधारा से सज्जित हैं और उसकी विधि के अनुसार है और जिसन महिलाओं की आज्ञा-पालन की विशेषता के जरिए सामाजिक व्यवस्था का नवीनीकरण सुनिश्चित किया जाता है, में सहनशीलता आत्मसंयम के भाव भी पैदा किए जाते हैं इस प्रकार, महिलाएं इसे उचित चिंतन नहीं मानती कि उनकी स्वयं अपनी भी काई - होनी चाहिए, क्योंकि यह माना जाता है कि परिवार में पुरुषों की जरूरतों के सामने उन्हें अपनी आवश्यकताओं का गाण त एं खुद चाहिए। महिलाओं को स्वयं को नष्ट कर देना चाहिए और उसके पति की पहचान द्वारा उसकी पहचान होनी चाहिए। माता अपने भाग्य को कोसती हैं कि वे औरत के रूप में पैदा हुई हैं और वे यह प्रार्थना करती हैं कि लड़कियां पैदा नहा हाना पा. वह दुर्गति का स्रोत होती हैं। यह भी कन्या शिशुओं की हत्या के मुख्य कारणों में से एक कारण है। वे यह नहीं सोचता जीवन के मार्ग को बदलना संभव है। वे यह महसूस करती हैं कि उनके पास लडकियों के अस्तित्व या उनके भविष्य का कोई विकल्प नहीं है।